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14.77 लाख का कथित गोबर घोटाला: मरवाही वनमंडल में फर्जी दस्तावेज, नगद आहरण और अफसरों की भूमिका पर उठे तीखे सवाल”

“गोबर खरीदी के नाम पर खेल या सुनियोजित घोटाला?” मरवाही वनमंडल में 14.77 लाख की कथित वित्तीय अनियमितता पर उठे बड़े सवाल, कार्रवाई नहीं होने से बढ़ी चर्चा

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।मरवाही वनमंडल एक बार फिर गंभीर आरोपों और प्रशासनिक सवालों के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला गोबर खरीदी के नाम पर हुए लगभग 14 लाख 77 हजार 600 रुपये के कथित वित्तीय घोटाले का है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली, वित्तीय पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता ने तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल, कैंपा शाखा प्रभारी भूपेंद्र साहू सहित अन्य संबंधित लोगों पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, कूटरचित हस्ताक्षर कराने और शासकीय राशि के कथित दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों और लगातार शिकायतों के बावजूद अब तक न तो किसी प्रकार की ठोस विभागीय कार्रवाई सामने आई है और न ही एफआईआर दर्ज होने की कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक हुई है।

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इसी कारण अब स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। सामाजिक संगठनों, ग्रामीणों और विभागीय सूत्रों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े कथित वित्तीय मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या विभाग के भीतर प्रभावशाली लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है या फिर मामला जानबूझकर लंबित रखा गया है? लोगों का कहना है कि यदि शिकायतों में कोई दम नहीं होता तो मामला इतनी दूर तक नहीं पहुंचता। दूसरी ओर यदि आरोप गंभीर हैं तो फिर जांच और कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हो रही है?

सूत्रों के मुताबिक यह मामला अब केवल विभागीय फाइलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन चुका है। बताया जा रहा है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर और ज्यादा गर्मा सकता है तथा विधानसभा तक भी पहुंच सकता है। यही कारण है कि अब पूरे मामले पर जनता की नजरें टिक गई हैं।

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शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गोबर खरीदी के नाम पर फर्जी प्रमाणक, कागजात और प्रस्ताव तैयार कर लगभग 14 लाख 77 हजार 600 रुपये के नगद आहरण की अनुमति जारी की गई। जबकि शासन के वित्तीय नियमों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में 5 हजार रुपये से अधिक का नगद भुगतान अनुमन्य नहीं माना जाता। इसके बावजूद कथित रूप से नियमों को दरकिनार कर बड़ी राशि नगद निकाली गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कागजों में पूरी प्रक्रिया वैधानिक और नियमित दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन वास्तविक खरीदी, भुगतान और भंडारण को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं।

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि पिपरिया वन प्रबंधन समिति में वन चौकीदार सुरेश राठौर को कथित रूप से सचिव की भूमिका में प्रस्तुत किया गया। जबकि नियमानुसार वन चौकीदार को किसी भी प्रकार के वित्तीय अधिकार प्राप्त नहीं होते। इसके बावजूद उनके नाम से दस्तावेज तैयार किए जाने, प्रस्तावों में हस्ताक्षर कराने और नगद आहरण की प्रक्रिया पूरी किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बल्कि नियमों की खुली अनदेखी और अधिकारों के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण माना जा सकता है।

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शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि पिपरिया और चूहा बहरा वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से राशि आहरित की गई तथा प्रस्ताव पारित करने के दौरान समिति अध्यक्षों के कथित फर्जी हस्ताक्षर तक किए गए। आरोप यह भी है कि पूरी प्रक्रिया बेहद सुनियोजित तरीके से की गई ताकि दस्तावेजों में सबकुछ वैध और नियमित दिखाई दे। शिकायत में दावा किया गया है कि निकाली गई राशि कैंपा शाखा प्रभारी भूपेंद्र साहू के माध्यम से तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल तक पहुंचाई गई। हालांकि इन आरोपों की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि जांच में ये बातें सही पाई जाती हैं तो मामला कूटरचना, धोखाधड़ी, शासकीय धन के दुरुपयोग और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर श्रेणियों में आ सकता है।

मामले में शिकायतकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल, कैंपा शाखा प्रभारी भूपेंद्र साहू, वन चौकीदार एवं कथित सचिव सुरेश राठौर और वन प्रबंधन समिति चूहा बहरा के सचिव श्रीकांत परिहार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इससे सरकारी योजनाओं और विभागीय व्यवस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होगा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग पहले भी कई विवादों को लेकर सुर्खियों में रहा है, लेकिन इस मामले ने विभागीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर और बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि आखिर इतने बड़े कथित वित्तीय मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को अब तक महत्वपूर्ण शाखाओं में कैसे बनाए रखा गया है। यही कारण है कि “संरक्षण”, “अंदरखाने सेटिंग” और “प्रभावशाली बचाव” जैसे आरोप भी लगातार सामने आ रहे हैं।

अब पूरे मामले में सबसे बड़ी परीक्षा प्रशासन और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता की मानी जा रही है। जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस कथित घोटाले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होगी या फिर मामला अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी तंत्र और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल होगा। वहीं यदि जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ती है तो इससे जनता के बीच जवाबदेही और पारदर्शिता का संदेश भी जा सकता है।

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